भारत में हेल्थ इंश्योरेंस: सुरक्षा कवच या छलावा?
भारत में हेल्थ इंश्योरेंस को कभी आम नागरिक के लिए सुरक्षा कवच माना गया था, परंतु हाल के वर्षों में यह व्यवस्था स्वयं एक गंभीर संकट का रूप लेती जा रही है। दिल्ली-एनसीआर सहित देश के कई बड़े शहरों में निजी अस्पतालों द्वारा कैशलेस इलाज की सुविधा बंद किया जाना, बीमा कंपनियों और अस्पतालों के बीच बढ़ते टकराव का स्पष्ट संकेत है। इसका सीधा दुष्परिणाम मरीजों पर पड़ रहा है, जिन्हें बीमारी के समय इलाज के साथ-साथ आर्थिक अनिश्चितता का भी सामना करना पड़ रहा है।
एक अनुमान के अनुसार भारत में लगभग 55–60 करोड़ लोग किसी न किसी रूप में हेल्थ इंश्योरेंस के दायरे में हैं, फिर भी बीमा क्लेम से जुड़ी शिकायतें लगातार बढ़ रही हैं। हालिया सर्वे बताते हैं कि हर तीन में से एक पॉलिसीधारक को क्लेम के समय कटौती, देरी या आंशिक भुगतान जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कई मामलों में बीमा कंपनियाँ इलाज की कुल लागत का केवल 60–70 प्रतिशत ही स्वीकार करती हैं, शेष राशि “नॉन-मेडिकल”, “पैकेज से बाहर” या “अनावश्यक प्रक्रिया” जैसे अस्पष्ट कारणों से काट ली जाती है।
स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब निजी अस्पताल कैशलेस सुविधा से बाहर हो जाते हैं। ऐसे में मरीज को पहले अपनी जेब से लाखों रुपये चुकाने पड़ते हैं और बाद में रिइम्बर्समेंट के लिए महीनों तक बीमा कंपनियों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। यह व्यवस्था उस मूल उद्देश्य के विपरीत है, जिसके लिए हेल्थ इंश्योरेंस अस्तित्व में आया था।
सरकारी स्वास्थ्य तंत्र की स्थिति भी कोई राहत नहीं देती। सीजीएचएस जैसी योजनाओं में लगातार नई बंदिशें जोड़ी जा रही हैं, जबकि सरकारी अस्पतालों में संसाधनों की भारी कमी है। एम्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में भी एक्स-रे, एमआरआई या विशेषज्ञ परामर्श के लिए हफ्तों नहीं, बल्कि महीनों का इंतज़ार आम बात हो चुकी है। परिणामस्वरूप मध्यम वर्ग और निम्न-मध्यम वर्ग निजी अस्पतालों और बीमा कंपनियों के दोहरे दबाव में फँस जाता है।
इस संकट की जड़ में सबसे बड़ी समस्या पारदर्शिता का अभाव है। बीमा कंपनियाँ अपने क्लेम सेटलमेंट के स्पष्ट मानदंड सार्वजनिक नहीं करतीं और अस्पतालों व मरीजों के बीच संवाद की कोई प्रभावी व्यवस्था नहीं है। नियामक संस्था IRDAI की भूमिका भी अब तक अपेक्षित कठोरता नहीं दिखा पाई है।
समाधान के लिए आवश्यक है कि सरकार और नियामक संस्थाएँ मिलकर एक पारदर्शी, मानकीकृत और मरीज-केंद्रित हेल्थ इंश्योरेंस प्रणाली विकसित करें। इलाज की दरों का यथार्थवादी निर्धारण, क्लेम अस्वीकृति के स्पष्ट कारण, समयबद्ध भुगतान और मजबूत शिकायत निवारण तंत्र आज की अनिवार्य आवश्यकता है।
स्वास्थ्य कोई विलासिता नहीं, बल्कि नागरिक का मौलिक अधिकार है। यदि हेल्थ इंश्योरेंस इसी तरह अविश्वसनीय होता गया, तो यह न केवल आम जनता का भरोसा तोड़ेगा, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र को सामाजिक असंतोष की ओर धकेल देगा। अब समय आ गया है कि सरकार बीमा कंपनियों पर सख्त दबिश बनाए और इस व्यवस्था को वास्तव में जनहितकारी बनाए।
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