शक्सगाम घाटी : भारत - चीन आमने-सामने

शक्सगाम घाटी को लेकर चीन का ताज़ा दावा केवल एक कूटनीतिक बयान नहीं, बल्कि एशिया की भू-राजनीति में चल रही गहरी रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का संकेत है। यह वही इलाका है जिसे पाकिस्तान ने 1963 में अवैध रूप से चीन को सौंप दिया था, जबकि भारत इसे जम्मू-कश्मीर का अभिन्न हिस्सा मानता है। अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार, किसी विवादित क्षेत्र में तीसरे पक्ष को भूमि सौंपना वैध नहीं माना जाता, और यही भारत की आपत्ति का मूल आधार है।

चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) इस विवाद को और जटिल बनाता है। लगभग 60 अरब डॉलर की इस परियोजना का उद्देश्य केवल व्यापारिक संपर्क नहीं, बल्कि चीन को अरब सागर तक सीधी रणनीतिक पहुंच देना है। शक्सगाम घाटी से गुजरने वाली सड़कें सैन्य और लॉजिस्टिक दृष्टि से भी अहम हैं, जो भारत की सुरक्षा चिंताओं को स्वाभाविक बनाती हैं।

चीन का यह कहना कि “अपने इलाके में इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना उसका अधिकार है”, वस्तुतः यथास्थिति बदलने की नीति को दर्शाता है—पहले निर्माण, फिर दावा। भारत ने बार-बार स्पष्ट किया है कि वह जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में किसी भी विदेशी अवैध गतिविधि को स्वीकार नहीं करेगा।

यह विवाद केवल सीमा रेखाओं का नहीं, बल्कि नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनाम ताकत आधारित विस्तारवाद की टकराहट का प्रतीक बनता जा रहा है। आने वाले समय में यह मुद्दा भारत-चीन संबंधों की दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

डाॅक्टर भारत के ,अस्पताल विदेशों के -: Top -50 में भारत शामिल नहीं

भारत में हेल्थ इंश्योरेंस: सुरक्षा कवच या छलावा?