डाॅक्टर भारत के ,अस्पताल विदेशों के -: Top -50 में भारत शामिल नहीं
विश्व के Top 50 अस्पतालों की सूची में 20 देशों के नाम हैं, पर भारत का नहीं। यह तथ्य जितना चौंकाने वाला है, उससे अधिक आत्ममंथन की मांग करता है। विडंबना यह है कि इन अस्पतालों में बड़ी संख्या भारतीय मूल के डॉक्टरों की है। प्रश्न स्पष्ट है— जब प्रतिभा हमारी है, तो संस्थान हमारे क्यों नहीं?
भारत ने दशकों से विश्व को उत्कृष्ट चिकित्सक दिए हैं, लेकिन उन्हें वह संरचना नहीं दी जिसमें विश्व-स्तरीय चिकित्सा संस्थान विकसित हो सकें। विकसित देशों में अस्पताल केवल इलाज का केंद्र नहीं, बल्कि रिसर्च, इनोवेशन और मेडिकल नीति-निर्माण के स्तंभ होते हैं। भारत में अस्पताल आज भी अधिकतर मरीजों की भीड़ संभालने तक सीमित हैं।
स्वास्थ्य पर भारत का सरकारी खर्च GDP के 2% से भी कम है, जबकि जिन देशों के अस्पताल Top 50 में हैं, वहाँ यह 8–10% तक है। नतीजतन सरकारी अस्पताल संसाधनों की कमी से जूझते हैं और निजी अस्पताल मुनाफे के दबाव में वैश्विक मानकों से पीछे रह जाते हैं।
समाधान स्पष्ट है— भारत को चुनिंदा अस्पतालों को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त कर, अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार विकसित करना होगा। मेडिकल रिसर्च को प्राथमिकता देनी होगी और इलाज को ज्ञान-उत्पादन से जोड़ना होगा।
भारत डॉक्टरों का कारखाना नहीं, संस्थानों का निर्माता बने— तभी यह विडंबना समाप्त होगी।
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