संदेश

शक्सगाम घाटी : भारत - चीन आमने-सामने

चित्र
शक्सगाम घाटी को लेकर चीन का ताज़ा दावा केवल एक कूटनीतिक बयान नहीं, बल्कि एशिया की भू-राजनीति में चल रही गहरी रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का संकेत है। यह वही इलाका है जिसे पाकिस्तान ने 1963 में अवैध रूप से चीन को सौंप दिया था, जबकि भारत इसे जम्मू-कश्मीर का अभिन्न हिस्सा मानता है। अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार, किसी विवादित क्षेत्र में तीसरे पक्ष को भूमि सौंपना वैध नहीं माना जाता, और यही भारत की आपत्ति का मूल आधार है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) इस विवाद को और जटिल बनाता है। लगभग 60 अरब डॉलर की इस परियोजना का उद्देश्य केवल व्यापारिक संपर्क नहीं, बल्कि चीन को अरब सागर तक सीधी रणनीतिक पहुंच देना है। शक्सगाम घाटी से गुजरने वाली सड़कें सैन्य और लॉजिस्टिक दृष्टि से भी अहम हैं, जो भारत की सुरक्षा चिंताओं को स्वाभाविक बनाती हैं। चीन का यह कहना कि “ अपने इलाके में इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना उसका अधिकार है ”, वस्तुतः यथास्थिति बदलने की नीति को दर्शाता है—पहले निर्माण, फिर दावा। भारत ने बार-बार स्पष्ट किया है कि वह जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में किसी भी विदेशी अवैध गतिविधि को स्वीकार नहीं करेग...

भारत में हेल्थ इंश्योरेंस: सुरक्षा कवच या छलावा?

चित्र
भारत में हेल्थ इंश्योरेंस को कभी आम नागरिक के लिए सुरक्षा कवच माना गया था, परंतु हाल के वर्षों में यह व्यवस्था स्वयं एक गंभीर संकट का रूप लेती जा रही है। दिल्ली-एनसीआर सहित देश के कई बड़े शहरों में निजी अस्पतालों द्वारा कैशलेस इलाज की सुविधा बंद किया जाना, बीमा कंपनियों और अस्पतालों के बीच बढ़ते टकराव का स्पष्ट संकेत है। इसका सीधा दुष्परिणाम मरीजों पर पड़ रहा है, जिन्हें बीमारी के समय इलाज के साथ-साथ आर्थिक अनिश्चितता का भी सामना करना पड़ रहा है। एक अनुमान के अनुसार भारत में लगभग 55–60 करोड़ लोग किसी न किसी रूप में हेल्थ इंश्योरेंस के दायरे में हैं, फिर भी बीमा क्लेम से जुड़ी शिकायतें लगातार बढ़ रही हैं। हालिया सर्वे बताते हैं कि हर तीन में से एक पॉलिसीधारक को क्लेम के समय कटौती, देरी या आंशिक भुगतान जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कई मामलों में बीमा कंपनियाँ इलाज की कुल लागत का केवल 60–70 प्रतिशत ही स्वीकार करती हैं, शेष राशि “ नॉन-मेडिकल ”, “ पैकेज से बाहर ” या “ अनावश्यक प्रक्रिया ” जैसे अस्पष्ट कारणों से काट ली जाती है। स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब निजी अस्पता...

डाॅक्टर भारत के ,अस्पताल विदेशों के -: Top -50 में भारत शामिल नहीं

चित्र
विश्व के Top 50 अस्पतालों की सूची में 20 देशों के नाम हैं, पर भारत का नहीं। यह तथ्य जितना चौंकाने वाला है, उससे अधिक आत्ममंथन की मांग करता है। विडंबना यह है कि इन अस्पतालों में बड़ी संख्या भारतीय मूल के डॉक्टरों की है। प्रश्न स्पष्ट है— जब प्रतिभा हमारी है, तो संस्थान हमारे क्यों नहीं? भारत ने दशकों से विश्व को उत्कृष्ट चिकित्सक दिए हैं, लेकिन उन्हें वह संरचना नहीं दी जिसमें विश्व-स्तरीय चिकित्सा संस्थान विकसित हो सकें। विकसित देशों में अस्पताल केवल इलाज का केंद्र नहीं, बल्कि रिसर्च, इनोवेशन और मेडिकल नीति-निर्माण के स्तंभ होते हैं। भारत में अस्पताल आज भी अधिकतर मरीजों की भीड़ संभालने तक सीमित हैं। स्वास्थ्य पर भारत का सरकारी खर्च GDP के 2% से भी कम है, जबकि जिन देशों के अस्पताल Top 50 में हैं, वहाँ यह 8–10% तक है। नतीजतन सरकारी अस्पताल संसाधनों की कमी से जूझते हैं और निजी अस्पताल मुनाफे के दबाव में वैश्विक मानकों से पीछे रह जाते हैं। समाधान स्पष्ट है— भारत को चुनिंदा अस्पतालों को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त कर, अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार विकसित करना होगा। मेडिकल रिसर्च...

ग्रीनलैंड और अमेरिका: आर्कटिक भू-राजनीति का अनिवार्य भविष्य

चित्र
आर्कटिक भू-राजनीति का अनिवार्य भविष्य  अमेरिका द्वारा ग्रीनलैंड पर आधिपत्य स्थापित करना या वहाँ जनमत-संग्रह (रेफरेंडम) के माध्यम से उसे अपने प्रभाव क्षेत्र में लाना कोई असामान्य या अव्यावहारिक घटना नहीं होगी । इतिहास गवाह है कि संयुक्त राज्य अमेरिका एक “स्थिर भौगोलिक इकाई” नहीं बल्कि विस्तारशील राज्यों का संघ रहा है ।  वर्ष 1803 में फ्रांस से लुइजियाना की खरीद (लगभग 15 मिलियन डॉलर में) और 1867 में रूस से अलास्का की खरीद (7.2 मिलियन डॉलर में) आज अमेरिकी शक्ति-निर्माण के सबसे सफल निर्णय माने जाते हैं ।। अलास्का का उदाहरण विशेष रूप से प्रासंगिक है । कभी “सेवार्ड्स फॉली” कहे जाने वाला अलास्का आज अमेरिका के लिए रणनीतिक, सैन्य और ऊर्जा सुरक्षा का स्तंभ है । यह रूस से मात्र 85 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, जहाँ से अमेरिका न केवल रूस पर निगरानी रखता है बल्कि आर्कटिक क्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति भी सुनिश्चित करता है । अलास्का में मौजूद मिसाइल डिफेंस सिस्टम, एयरबेस और रडार नेटवर्क अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा का अभिन्न हिस्सा हैं । इसी संदर्भ में ग्रीनलैंड का महत्व और भी ...

संसाधन, सत्ता और वैश्विक हस्तक्षेप: बदलती विश्व राजनीति का अगला अध्याय

चित्र
समकालीन वैश्विक राजनीति को यदि किसी एक सूत्र में बाँधा जाए, तो वह है—संसाधनों पर नियंत्रण । लोकतंत्र, मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय कानून अब केवल भाषणों की शोभा बनकर रह गए हैं; वास्तविक युद्ध आज मिनरल्स, ऊर्जा और रणनीतिक भूभाग के लिए लड़े जा रहे हैं । वेनेज़ुएला के घटनाक्रम के बाद यह स्पष्ट होता जा रहा है कि अमेरिकी रणनीति का अगला चरण ग्रीनलैंड, ईरान और संसाधन-समृद्ध अफ्रीकी देशों की ओर केंद्रित होगा । ग्रीनलैंड :  ग्रीनलैंड Iron समय तक वैश्विक राजनीति के हाशिए पर रहा, किंतु जलवायु परिवर्तन ने उसकी भौगोलिक नियति बदल दी है । बर्फ के पिघलने के साथ ही वहाँ रेयर अर्थ मिनरल्स, लिथियम, कोबाल्ट, यूरेनियम और निकल जैसे संसाधनों तक पहुँच संभव हो रही है। ये वही खनिज हैं जिन पर आधुनिक सभ्यता की रीढ़—इलेक्ट्रिक वाहन, सेमीकंडक्टर, मिसाइल सिस्टम और नवीकरणीय ऊर्जा—निर्भर करती है । आज स्थिति यह है कि दुनिया के लगभग 70 प्रतिशत रेयर अर्थ मिनरल्स की प्रोसेसिंग चीन के नियंत्रण में है । अमेरिका के लिए यह केवल आर्थिक चुनौती नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न है । इसी संदर्भ में ट्रम्प द्वारा ग्रीनलैंड...
चित्र
 हम सबके प्रिय 'नेता जी सुभाष चन्द्र बोस' जी ने 25 मार्च 1942 को 'बर्लिन' से 'आजाद हिंद रेडियो' के माध्यम से जनमानस को संबोधित करते हुए भारत विभाजन के लिए प्रयत्नशील अंग्रेजी षड्यंत्रों को ऐतिहासिक उदाहरण के साथ बताने का प्रयास किया था..... नेता जी ने बार-बार आने वाले संकट पर तत्तकालीन शीर्ष नेतृत्व को आगाह करने का प्रयास किया। उन्होंने अंग्रेजी षड्यंत्रों के प्रति जो चिंता जाहिर की थी, वह भविष्य में उसी रूप में हमारे सामने उपस्थित हुई और उसका परिणाम हमें भारत विभाजन के रूप में देखने को मिला......!  नेता जी ने रेडियो के माध्यम से जो संदेश दिया था.... उनमें से कुछ महत्वपूर्ण विषय जिन पर नेता जी ने विशेष ध्यानाकर्षण का प्रयास किया था,वह कुछ इस प्रकार हैं...... 1. "मैंने व्रिटिश सरकार के आफर तथा उस संबंध में क्रिप्स महोदय के भाषण का ध्यानपूर्वक अध्ययन किया। उसके अध्ययन के उपरांत मुझे यह विश्वास हो गया कि क्रिप्स भारत में व्रिटिश साम्राज्यवाद की पुरानी नीति 'फूट डालो और शासन करो' को कार्यान्वित करने के लिए एक बार फिर प्रयत्न करने जा रहे हैं। भारत में ऐस...

इतिहास-वर्तमान और भविष्य

चित्र
इतिहास ......उन तमाम पक्षों से हम सबको अवगत कराने के लिए होता है जो पूर्व में घटित हुए .....उस वक्त से सीखने के लिए होता है जो निरंतर तीव्र गति से चलते समय के चक्र के आगोश में समाकर बीता हुआ कल बन चुका है...... इतिहास जीने के लिए नहीं होता है..... इतिहास सीखने के लिए होता है...... इतिहास में जीकर हम प्रगति की चेष्टा कर ही नहीं सकते.....सिवाय निरंतर पतन को आमंत्रित करने के..…. इतिहास गर्व करने का विषय अवश्य हो सकता है लेकिन उस गर्व के चक्कर में वहीं एक ही जगह स्थिर हो जाना इतिहास के साथ बिल्कुल भी न्याय नहीं हो सकता...... इतिहास के जिस घटना को हम मात्र गर्व करने मात्र की तारीख मान लेते हैं दरअसल वह तिथि/घटना असल में हमें नई चुनौतियां दे रही होती है ...... वर्तमान और भविष्य में उस गर्व करने वाली तिथि/घटनाओं से भी इतना अच्छा करने की....जिससे आने वाला कल आपके आज के कार्यों पर गर्व करे न कि वो भी आपकी /हमारी तरह उसी तिथि पर/इतिहास पर गर्व करता रहे जिस पर हम गर्व करते-करते काल के आगोश में समा गये....। हमें गुजरे हुए कल से सीख लेनी चाहिए..... वर्तमान में कदम बढ़ाना चाहिए..... लेकि...